मातृभाषाओं के संवाद से सुदृढ़ होगी राष्ट्रीय एकता : डॉ. युद्धिष्ठिर जी महाराज

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मातृभाषाओं के संवाद से सुदृढ़ होगी राष्ट्रीय एकता : डॉ. युद्धिष्ठिर जी महाराज

छुरा–:–आईएसबीएम विश्वविद्यालय, नवापारा (कोसमी) में राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के विशेष सहयोग से हिन्दी विभाग, कला एवं मानविकी संकाय द्वारा “सिंधी एवं छत्तीसगढ़ी : भाषा एवं संस्कृति का आदान-प्रदान” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन शनिवार को किया गया। इस संगोष्ठी में भारतीय भाषाओं की साझा सांस्कृतिक विरासत, लोकपरंपराओं और भाषायी संवाद पर चर्चा-परिचर्चा की गई। विद्यार्थी बुक डिपो एवं जनरल स्टोर्स, भिलाई 3, और सागर इंटरप्राइजेस, छुरा का इस कार्यक्रम के लिए विशेष सहयोग किया।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता शदाणी दरबार के पीठाधीश्वर संत श्री युधिष्ठिर लाल जी महाराज ने अपने उद्बोधन में भारतीय भाषाओं की आत्मिक एकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, मूल्य और जीवन-दृष्टि की संवाहक होती है। उन्होंने मातृभाषाओं के प्रति कम होती मोह को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने सिंधी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं की लोकचेतना, परंपरा और सांस्कृतिक साम्य को रेखांकित किया।
विशिष्ट वक्ता के रूप में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के हिन्दी आचार्य एवं प्रख्यात भाषाविद् डॉ. गिरिजाशंकर गौतम ने दोनों भाषाओं के ऐतिहासिक, साहित्यिक और भाषावैज्ञानिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन और आपसी संवाद से भारतीय भाषिक परंपरा और अधिक समृद्ध होती है।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. जे. सी. अजवानी ने भाषा और संस्कृति के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर अपने विचार साझा किए तथा भाषायी पहचान को जीवन एवं संस्कृति से से जोड़ा।
इस अवसर पर छात्रों और शोधार्थियों को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आनंद महलवार ने कहा कि सिंधी और छत्तीसगढ़ी जैसी भारतीय भाषाएँ राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं। भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और आपसी संवाद से ही सांस्कृतिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण संभव है।
कुलसचिव डॉ बीपी भोल ने कहा कि संस्कृतियों को ज़िंदा रखने में लोक भाषाओं का बहुत योगदान है। लोकभाषाएँ हमें जीवन और परम्परा से जोड़ती हैं। शैक्षणिक अधिष्ठाता डॉ एन कुमार स्वामी ने सिंधी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के सांस्कृतिक पक्ष की ओर ध्यान दिलाया।
छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ. शुभाशीष बिस्वास के सतत प्रयासों और प्रभावी समन्वय से आयोजन को आवश्यक सहयोग एवं व्यवस्थागत सुदृढ़ता प्राप्त हुई। संगोष्ठी में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही।

मालूम हो कि प्रथम सत्र में डॉ. पूनम वर्मा, डॉ मुमताज परवीन और डॉ अश्वनी कुमार साहू ने अपना संबोधन दिया।
संगोष्ठी का संयोजन कला एवं मानविकी संकाय के अध्यक्ष एवं हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. दिवाकर तिवारी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन सुश्री सुकृति पाठक ने किया। आयोजन को सफल बनाने में संकाय के सभी सदस्यों—डॉ. अश्वनी कुमार साहू, डॉ. पद्मलोचन राउत, डॉ. जब्बार अहमद, डॉ. मुमताज परवीन, डॉ. संध्या बिसेन, श्री कृष्ण कुमार, श्री मोहित राम चेलक, श्री अशोक साहू, श्री रमेश कुमार नायक, सुश्री भमाती साहू एवं सुश्री कविता साहू—सहित विश्वविद्यालय के अन्य संकायों के शिक्षकों का सक्रिय सहयोग रहा।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भाषायी अध्ययन, सांस्कृतिक विमर्श और अंतर-क्षेत्रीय संवाद को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सार्थक पहल सिद्ध हुई।

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