कक्षा में पढ़ाने से पहले ऐसी गतिविधियाँ कराई जानी चाहिए : अंजली अवधिया

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कक्षा में पढ़ाने से पहले ऐसी गतिविधियाँ कराई जानी चाहिए : अंजली अवधिया

छुरा–:–आईएसबीएम विश्वविद्यालय नवापारा कोसमी छुरा में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम (एफडीपी) का उद्घाटन समारोह सम्पन्न हुआ जिसके मुख्य अतिथि शासकीय कमलादेवी राठी महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव की प्राचार्या प्रो. अंजली अवधिया थी। विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएससी) के अंतर्गत आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में बदलते समय के साथ शिक्षण की नई विधियों पर चर्चा की गई।
मुख्य वक्ता प्रो. अंजली अवधिया ने अपने संबोधन में कहा कि आज यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ‘पैडगॉजी क्या है’ और शिक्षा का वास्तविक आउटकम क्या होना चाहिए। समय के साथ शिक्षा को भी बदलना ही होगा। 21वीं सदी में आवश्यक स्किल्स बदल चुकी हैं। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, प्रभावी संप्रेषण क्षमता और नवाचार को विकसित करना है।
उन्होंने कहा कि आज गाइडेड इंस्ट्रक्शन की अपेक्षा कंस्ट्रक्टिविज़्म (निर्माणवाद) को अपनाने की आवश्यकता है, जहाँ विद्यार्थी स्वयं ज्ञान का निर्माण करता है। केवल सूचनाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज्ञान का विस्तार और गहनता आवश्यक है। भाषा से पहले विचार जन्म लेता है, विचार चित्रों में विकसित होता है और उन चित्रों को स्पष्ट करने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है।
प्रो. अवधिया ने कहा कि जनरल एजुकेशन (GE) के अंतर्गत विषयों को अपने आसपास के समाज से जोड़कर पढ़ाना आज की प्रभावी शिक्षण विधि है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में फिल्म जैसे माध्यम भी उपयोगी हो सकते हैं। इसके साथ ही मूल्यांकन के तरीकों में भी बदलाव जरूरी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि कक्षा में पढ़ाने से पहले ऐसी गतिविधियाँ कराई जानी चाहिए, जिससे विद्यार्थी शिक्षक और विषय से जुड़ सकें। बच्चे के मस्तिष्क को सक्रिय और संलग्न करना शिक्षक का पहला कार्य होना चाहिए, उसके बाद ही विषयवस्तु पर आना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शिक्षक को कभी कोई मशीन प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।
अंत में उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को विषय की सामग्री पहले ही उपलब्ध करा दी जानी चाहिए और कक्षा में आकर प्रयोग, चर्चा और संवाद के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। शिक्षक को सदैव वैकल्पिक और सहायक कंटेंट तैयार रखना चाहिए।
प्रो. आनंद महलवार ने कहा कि शिक्षण की अनेक विधियाँ उपलब्ध हैं, किंतु ज़मीनी स्तर पर उनका प्रभाव तभी दिखाई देता है जब शिक्षक स्वयं को निरंतर बेहतर बनाने के लिए तैयार रहता है। स्वयं का सतत् विकास, नए प्रयोगों के प्रति openness और आत्ममूल्यांकन ही एक अच्छे शिक्षक की वास्तविक पहचान है। प्रश्न यह है कि हम शोध और नवाचार के लिए कितने तैयार हैं—क्योंकि वहीं से शिक्षा की गुणवत्ता और प्रासंगिकता का निर्माण होता है।
कुलसचिव डॉ बीपी भोल ने कहा कि शिक्षण विधियाँ कोई एकरूप या स्थिर संरचना नहीं होतीं। शिक्षा का कोई एक ‘यूनिफॉर्म’ नहीं हो सकता। साहित्य, कला और मानविकी जैसे विषयों को प्रबंधन या विज्ञान की शिक्षण विधियों से समझाया नहीं जा सकता। प्रत्येक विषय की अपनी प्रकृति, संवेदना और बौद्धिक मांग होती है। इसलिए हर विषय के अध्ययन और अध्यापन के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण, विधि और समझ की आवश्यकता होती है।
इस अवसर पर छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ शुभाशीष बिस्वास ने कहा कि बदलते समय के साथ आज हमारा अनुभव बदल रहा है इसलिए शिक्षण करने की विधियाँ भी अवश्य बदलनी चाहिए।
मुख्य अतिथि का परिचय विज्ञान संकाय की विभागाध्यक्ष डॉ पूनम वर्मा ने किया। स्वागत वक्तव्य डॉ पी विश्वनाथन ने दिया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ एन कुमार स्वामी ने दिया। इस कार्यक्रम का संचालन सुश्री सुकृति पाठक ने किया।

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