मोदी सरकार का आम बजट: नई बोतल में पुरानी शराब, जनता को सिर्फ निराशा, बजट शेयर बाजार को भी ले डूबा— हरमेश चावड़ा

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मोदी सरकार का आम बजट: नई बोतल में पुरानी शराब, जनता को सिर्फ निराशा, बजट शेयर बाजार को भी ले डूबा— हरमेश चावड़ा

मोदी सरकार का आम बजट पेश होते ही जनता और विशेषज्ञों की राय आना चालू हो गयी है वही काँग्रेस नेता और पूर्व जनभागीदारी अध्यक्ष हरमेश चावड़ा ने कहा कि बजट को लेकर जनता में निराशा का माहौल देखने को मिला। बजट का पूरा खाका यह संकेत दे रहा है कि सरकार एक बार फिर ऋण लेने की तैयारी में है, लेकिन जनता को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैंl
उल्टे शेयर बाजार ने मोदी सरकार के बजट की दिशा और दशा दोनों बयां कर दी l बजट ऐसा की शेयर बाजार औंधे मुंह गिर पड़ा l

 

बजट में क्या है खास और क्या है गायब?

1. किसानों के लिए कोई नई योजना नहीं – कृषि क्षेत्र को इस बजट में पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। किसानों को राहत देने के लिए किसी भी तरह की ठोस योजना नहीं बनाई गई है।

2. बेरोजगारों के लिए कोई समाधान नहीं – युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसरों का अभाव है। कोई नई योजना नहीं लाई गई, जिससे बेरोजगारी की समस्या और गंभीर हो सकती है।

3. महंगाई से राहत के कोई संकेत नहीं – महंगाई कम करने को लेकर सरकार की गंभीरता इस बजट में कहीं नजर नहीं आई। जनता को राहत देने के लिए कोई नई पहल नहीं की गई है।

4. ऋण पर निर्भरता बढ़ेगी – बजट के आकार से स्पष्ट हो रहा है कि सरकार एक बार फिर ऋण लेने की योजना बना रही है, जिससे आने वाले समय में वित्तीय असंतुलन बढ़ सकता है।

 

गाँव, गरीब और किसान सरकार की प्राथमिकता से बाहर?

यह बजट ग्रामीण भारत, गरीब तबके और किसानों के लिए किसी भी प्रकार की राहत देने में असफल रहा है। सरकार का ध्यान विकास कार्यों से हटकर अन्य क्षेत्रों में अधिक केंद्रित दिख रहा है।
बजट की आलोचना
बजट किसी भी सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का आईना होता है। इसमें देश के विकास, गरीब-कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए योजनाएँ घोषित की जाती हैं। लेकिन हर बजट की तरह इसमें भी कुछ सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ कई कमियाँ देखने को मिलती हैं, जिनकी आलोचना आवश्यक है।
सबसे बड़ी आलोचना यह है कि महँगाई और आम आदमी की समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। रोज़मर्रा की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन करों में राहत या प्रत्यक्ष लाभ सीमित रहा। मध्यम वर्ग को कर-राहत की उम्मीद थी, जो पूरी तरह पूरी नहीं हो सकी।
दूसरी ओर, कृषि और ग्रामीण विकास के लिए घोषणाएँ तो की गईं, पर ज़मीनी स्तर पर उनके प्रभाव को लेकर संदेह बना रहता है। किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की दिशा में ठोस और समयबद्ध योजनाओं का अभाव दिखता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बजट आवंटन अपेक्षाकृत कम माना जा रहा है। सरकारी स्कूलों, उच्च शिक्षा, और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता थी, जो पर्याप्त नहीं दिखता।
इसके अलावा, रोज़गार सृजन पर स्पष्ट और व्यापक रणनीति की कमी भी एक प्रमुख आलोचना है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु उद्योगों, MSME और स्टार्टअप्स को अधिक प्रभावी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था।
अंततः, बजट में दीर्घकालिक विकास की बात तो की गई है, लेकिन सामाजिक समानता और आम जनता की तात्कालिक समस्याओं के समाधान पर अपेक्षित ज़ोर नहीं दिखता। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बजट संतुलित होने का प्रयास करता है, पर आम आदमी की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता।

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