बोरे-बासी से गूंजा श्रमिक दिवस, पार्षद छगन यादव का ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज,किसान-मजदूर की थाली को बताया ‘अमृत’, परंपरा को दिलाया नया सम्मान,भीषण गर्मी में ऊर्जा का पावरहाउस बना बोरे-बासी, नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का संदेश

बोरे-बासी से गूंजा श्रमिक दिवस, पार्षद छगन यादव का ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज,किसान-मजदूर की थाली को बताया ‘अमृत’, परंपरा को दिलाया नया सम्मान,भीषण गर्मी में ऊर्जा का पावरहाउस बना बोरे-बासी, नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का संदेश

इन्हे भी जरूर देखे

बोरे-बासी से गूंजा श्रमिक दिवस, पार्षद छगन यादव का ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज,किसान-मजदूर की थाली को बताया ‘अमृत’, परंपरा को दिलाया नया सम्मान,भीषण गर्मी में ऊर्जा का पावरहाउस बना बोरे-बासी, नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का संदेश


गरियाबंद–:– अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर गरियाबंद जिला कांग्रेस कार्यालय सहायक जिला प्रभारी एवं पार्षद छगन यादव ने अपने निवास पर पारंपरिक अंदाज में बोरे-बासी खाकर श्रमिक दिवस मनाया। इस मौके पर उन्होंने प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह केवल भोजन नहीं, बल्कि मेहनतकश वर्ग के सम्मान का प्रतीक है।

छगन यादव ने कहा कि बोरे-बासी छत्तीसगढ़ के किसान और मजदूरों का सदियों पुराना मुख्य आहार रहा है, जिसे आज पहचान मिल रही है। उन्होंने इसे गर्मी के मौसम में “अमृत” बताते हुए कहा कि इसमें भरपूर पोषक तत्व और विटामिन होते हैं, जो शरीर को ठंडक और ऊर्जा दोनों प्रदान करते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह परंपरा अब गांवों से निकलकर शहरों तक पहुंच रही है। स्कूलों, दफ्तरों और सामाजिक कार्यक्रमों में बोरे-बासी को अपनाया जा रहा है, जिससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ रही है। “यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और श्रमिक सम्मान का प्रतीक बन चुका है,” यादव ने कहा।

तपती गर्मी और 45 डिग्री के पार जाते तापमान में काम करने वाले मजदूरों के लिए बोरे-बासी किसी पावरहाउस से कम नहीं है। यह शरीर में पानी की कमी को दूर करता है और लू से बचाने में मददगार साबित होता है। खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए यह सस्ता, सुलभ और बेहद प्रभावी आहार है।

स्वाद के साथ इसका भावनात्मक जुड़ाव भी गहरा है। आम की चटनी, प्याज और हरी मिर्च के साथ खेत की मेड़ पर बैठकर बोरे-बासी खाने का अनुभव आज भी लोगों के दिलों में ताजा है। आधुनिक जीवनशैली के बीच भी यह देसी परंपरा अपनी सादगी के साथ जीवित है।

गौरतलब है कि बोरे-बासी में रात के बचे चावल को पानी में भिगोकर सुबह खाया जाता है। इसमें मौजूद प्रोबायोटिक गुण पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं और शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देते हैं। चिकित्सकों के अनुसार, यह पारंपरिक भोजन फास्ट फूड की तुलना में कहीं अधिक स्वास्थ्यवर्धक है।

श्रमिक दिवस पर बोरे-बासी का सेवन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि मेहनतकश वर्ग के प्रति सम्मान और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनता जा रहा है।

विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)

इन्हे भी जरूर देखे

Must Read