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अयोध्या से अमलीपदर पहुंचे “अमृत अक्षत कलश” भक्तिमय वातावरण में जगह-जगह पुष्प बरसाकर भजन-कीर्तन करते हुए,भव्य स्वागत किया गया।

अयोध्या से अमलीपदर पहुंचे “अमृत अक्षत कलश” भक्तिमय वातावरण में जगह-जगह पुष्प बरसाकर भजन-कीर्तन करते हुए,भव्य स्वागत किया गया।

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✍️ “लोकहित 24 न्यूज़ एक्सप्रेस लाइव” संवाददाता– टेलू राम कश्यप की रिपोर्ट गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

अयोध्या से अमलीपदर पहुंचे “अमृत अक्षत कलश” भक्तिमय वातावरण में जगह-जगह पुष्प बरसाकर भजन-कीर्तन करते हुए,भव्य स्वागत किया गया।

 

अमलीपदर-:–अयोध्या में 22 जनवरी को भव्य राम मंदिर में रामलला की प्रतिमा को विराजमान किया जाएगा इसके लिए जोर-शोर से तैयारियां चल रही है।राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में निमंत्रण के लिए 18 दिसंबर सोमवार को हिन्दु संगठन के लोगो ने अमलीपदर नगर में अक्षत पात्र का आतिशबाजी एवं पुष्प-वर्षा के साथ भव्य स्वागत करते हुए मां दुर्गा मंदिर में स्थापित किया है। इस दौरान हिन्दु संगठन के लोगों नें अक्षत कलश को सिर पर रखकर नगर में परिक्रमा भी की,जहां अक्षत कलश का अमलीपदर नगर में जगह-जगह पुष्प-वर्षा कर भगवान श्रीराम जी की जयघोष के साथ स्वागत किया गया,एवं नगर परिक्रमा के बाद मां दुर्गा मन्दिर में अक्षत कलश रखवाया गया।और इस अक्षत कलश का पीले चावल एवं पुष्प से अभिषेक किया गया।स्थानीय मां सीतला मंदिर से मां दुर्गा मंदिर तक भव्य शोभा यात्रा भी निकाली गई जिसमें नगर भ्रमण के साथ अक्षत कलश का जगह जगह स्वागत किया गया। श्रीराम सेना हिन्दु संगठन के डॉ. मनीष सिन्हा ने बताया कि 22 जनवरी को अयोध्या में भगवान श्री रामचंद्र जी का राज्याभिषेक प्राण प्रतिष्ठा पूजन कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया है अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण पूरे भारतवर्ष का सपना है जो कई संघर्ष व बलिदान के बाद पूरा हुआ है अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर पूजित अक्षत कलशों को आमंत्रण स्वरूप सभी क्षेत्रो में वितरित किया गया है एवं पूजित अक्षत कलश अमलीपदर नगर पहुंच गया है,जहां से अमलीपदर क्षेत्र में घर-घर जाकर लोगों को पीला अक्षत दिया जाएगा और लोगों को अयोध्या में होने वाले रामलला प्राण प्रतिष्ठा के लिये आमंत्रित किया जाएगा। श्रीराम सेना हर्ष कुमार सेंकलेचा ने बताया कि श्री राम तीर्थ न्यास समिति के आह्वान पर हिन्दु संगठन के लोग राम मंदिर के छाया चित्र एवं निमंत्रण पत्र के साथ अक्षत कलश लेकर हर घर जाएँगे और साथ आग्रह करेंगे जैसे आप सबने राम मदिर निर्माण में सहयोग किया है हम सभी राम मंदिर हेतु दर्शन करने अगर नहीं जा पाए तो अपने नगर ग्राम और निजनिवास को ही आयोध्य पूरी धाम मानकर 22 जनवरी को अपने नगर ग्राम में रामायण पाठ का आयोजना करे घर में दीपक जलाकर उत्साह मनाये। इस दौरान अक्षत कलश के स्वागत में नगर के श्रीराम सेना सहित विभिन्न हिन्दु संगठन के लोग उपस्थित थे।

*सनातन (हिंदू)शास्त्रों में कलश पूजन का महत्व और मंत्र*

सभी धार्मिक कार्यों में कलश का बड़ा महत्व है। जैसे मांगलिक कार्यों का शुभारंभ, नया व्यापार, नववर्ष आरंभ, गृह प्रवेश, दिवाली पूजन, यज्ञ, अनुष्ठान, दुर्गा पूजा आदि के अवसर पर सबसे पहले कलश स्थापना की जाती है।
धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश की स्थापना की जाती है। नवरा‍त्रि के दिनों में मंदिरों तथा घरों में कलश स्थापित किए जाते हैं तथा मां दुर्गा की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।


यह कलश विश्व ब्रह्मांड, विराट ब्रह्मा एवं भू-पिंड यानी ग्लोब का प्रतीक माना गया है। इसमें सम्पूर्ण देवता समाए हुए हैं। पूजन के दौरान कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है।कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।कलश में भरा पवित्र जल इस बात का संकेत हैं कि हमारा मन भी जल की तरह हमेशा ही शीतल, स्वच्छ एवं निर्मल बना रहें। हमारा मन श्रद्धा, तरलता, संवेदना एवं सरलता से भरे रहें। यह क्रोध, लोभ, मोह-माया, ईष्या और घृणा आदि कुत्सित भावनाओं से हमेशा दूर रहें।
कलश पर लगाया जाने वाला स्वस्तिष्क का चिह्न चार युगों का प्रतीक है। यह हमारी 4 अवस्थाओं, जैसे बाल्य, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था का प्रतीक है।पौराणिक शास्त्रों के अनुसार मानव शरीर की कल्पना भी मिट्टी के कलश से की जाती है। इस शरीररूपी कलश में प्राणिरूपी जल विद्यमान है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर अशुभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार रिक्त कलश भी अशुभ माना जाता है।


इसी कारण कलश में दूध, पानी, पान के पत्ते, आम्रपत्र, केसर, अक्षत, कुंमकुंम, दुर्वा-कुश, सुपारी, पुष्प, सूत, नारियल, अनाज आदि का उपयोग कर पूजा के लिए रखा जाता है। इसे शांति का संदेशवाहक माना जाता है।पूजा घर में स्थापना करने के है 3 फायदे…..

*अमृत का घड़ा*

यह मंगल-कलश समुद्र मंथन का भी प्रतीक है। सुख और समृद्धि के प्रतीक कलश का शाब्दिक अर्थ है- घड़ा। जल को हिन्दू धर्म में पवित्र माना गया है। अत: पूजा घर में इसे रखा जाता है। इससे पूजा सफल होती है। यह कलश उसी तरह निर्मित है जिस तरह की अमृत मंथन के दौरान मदरांचल को मथकर अमृत निकाला था। जैसे जटाओं से युक्त नारियल मदरांचल पर्वत है। कलश विष्णु के समाय और उसमें भरा जल क्षीरसागर के समान है। उस पर बंधा सूत वासुकि नाग है जिससे मंथन किया गया था। यजमान और पुरोहित सुर और असुरों की तरह हैं या कहें कि मंथनकर्ता हैं। पूजा के समय इसी तरह का मंत्र पढ़ा जाता है।


*ईशान कोण में जल की स्थापना*

वास्तु शास्त्र के अनुसार ईशान कोण में जल की स्थापना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। अत: मंगल कलश के रूप में जल की स्थापना करें। घर का ईशान कोण हमेशा खाली रखें और वहां पर मंगल कलश की स्थापना करें।

*वातावरण बना रहता है शुद्ध और सकारात्मक*

ऐसा कहते हैं कि मंगल कलश में तांबे के पात्र में जल भरा रहता है जिससे विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा उत्पन्न होती है। नारियल में भी जल भरा रहा है। दोनों के सम्मिलन से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के जैसा वातावरण निर्मित होता है जो वातावरण को दिव्य बनाती है। इसमें जो कच्चा सूत बांधा जाता है वह ऊर्जा को बांधे रखकर वर्तुलाकर वलय बनाता है। इस तरह यह एक प्रकार से सकारात्मक और शांतिदायक ऊर्जा का निर्माण करता है जो धीरे धीरे संपूर्ण घर में व्याप्त हो जाती है।

*कैसे रखा जाता मंगल कलश*

ईशान भूमि पर रोली, कुंकुम से अष्टदल कमल की आकृति बनाकर उस पर यह मंगल कलश रखा जाता है। एक कांस्य या ताम्र कलश में जल भरकल उसमें कुछ आम के पत्ते डालकर उसके मुख पर नारियल रखा होता है। कलश पर रोली, स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर, उसके गले पर मौली (नाड़ा) बांधी जाती है।

*मंत्र और प्रार्थना*

हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है।

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।

आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के कलश/घट में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।

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