शिक्षा सत्र 2025-26 में विद्यार्थी छाता ओढ़कर तो कभी पेड़ के नीचे किये विद्या अध्ययन शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट

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शिक्षा सत्र 2025-26 में विद्यार्थी छाता ओढ़कर तो कभी पेड़ के नीचे किये विद्या अध्ययन शिक्षा व्यवस्था पर करारी चोट

गरियाबंद /देवभोग–:–छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में विगत वर्षों आई थी एक तस्वीर यह तस्वीर न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि पूरे सिस्टम को संवेदनहीनता को उजागर कर देती है। विकास खण्ड देवभोग के अंतर्गत आने वाले ऐसे कई स्कूल भवने है, उस समय एक अचंभित स्थिति देखने को मिली।जब छात्र-छात्राएं पढ़ाई के दौरान छाता ओढ़कर बैठने को मजबूर हो गए। विद्यालय की जर्जर छतों से लगातार बारिश का पानी टपकता रहा, छात्रों की आंखों में ज्ञान की ज्योति कम और व्यवस्था की मार का दर्द ज्यादा दिख रहा था।

छतें टपकती रही, उम्मीदें भीगती रही

यह दृश्य किसी आपदा ग्रस्त क्षेत्र का नहीं बल्कि उस देश के सरकारी स्कूलों का है जहां हर साल सबको नतीजा, छात्रों को बारिश से बचने के लिए खुद की छतरी का सहारा लेना पड़ा था। क्योंकि स्कूल की छत उन्हें सुरक्षा नहीं दे पा रही थी। क्लास रूम के भीतर बारिश की बूंदें बेहिचक टपक रही थी, और पढ़ाई के पवित्र मंदिर को एक बदलाव ढांचे में बदल चुकी थी।

बजट में शोर जमीनी हकीकत में चुप्पी

सरकार हर साल शिक्षा के लिए भारी रकम बजट पास करती है। योजनाएं बनती है, घोषणाएं होती है, आंकड़ों को बाजीगरों दिखाई जाती है। लेकिन वास्तविक यह है कि कमीशन खोरों ठेकादारी और फाइलों में बंद मरम्मत योजनाएं ही इस हालात की सबसे बड़ी गुनहगार है,ना भवनों को मरम्मत हुई,ना फर्नीचर सुधरे,ना शौचालय चालू है, और ना ही बच्चों को समय पर किताबें मिली है।जिले के कई स्कूलों में आज भी किताबों की आपूर्ति नहीं हुई । शिक्षा विभाग आंखें बन्द करके चुपचाप बैठी रही।

शाला प्रवेश उत्सव जमीनी सच्चाई से कोसों दूर दिखावे का त्योहार

प्रत्येक वर्ष शिक्षा सत्र प्रारंभ में धूमधाम से मनाया जाने वाला शाला प्रवेशोत्सव अब एक ढकोसला मात्र बनकर रह गया है।मच पर नेता मुस्कुरा रहे हैं अफसर भाषण दे रहे होते हैं, और कैमरों के फ्लेश चमक रहे होते हैं। लेकिन इन उत्सवों में ना किसी को दीवारों की फटी पलस्तर दिखती है,ना सीलन से लथपथ छतें, और ना ही इन बच्चों की लाचारी।शाला प्रवेशोत्सव के नाम पर हो रही तड़क भड़क से ज्यादा जरूरी है कि स्कूलों को बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दिया जाए, लेकिन अफसरों और नेताओं के लिए यह प्राथमिकता नहीं रह गई है।

पढ़ाई दिन बीत गए लेकिन किताबें मिली नहीं, स्कूल बच्चे छतरी लेकर आए

पिछले साल विद्यालय खुल गई थी और कक्षाएं संचालित हो रही थी, लेकिन जिले के तमाम स्कूलों में बच्चों के लिए किताबें नहीं मिली। क्या यही है गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का दाव ?जब छत टपक रही हो, किताब नहीं हो और बैठने की व्यवस्था तक दयनीय हो ।तब उन बच्चों से शिक्षा के उज्जवल भविष्य की उम्मीद करना न्यायसंगत है ?

प्रश्न अब चुभने चाहिए ?

क्या शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इन स्कूलों की दशा नहीं दिखती? क्या स्कूल भवनों की मरम्मत के नाम पर पास हुए बजट कागजों में ही खत्म हो जाते हैं ? क्या बच्चों का कसूर सिर्फ यह है कि वे सरकारी स्कूलों में पढ़ते है।

सवाल और जवाब से जनता घेरना शुरू करेंगे

इस तरह की तस्वीरें केवल सोशल मीडिया पर वायरल होकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई और जबावदेही का आधार बननी चाहिए। शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अब सिर्फ भाषण नहीं, जमीन पर समाधान देना होगा।

निष्कर्ष
विगत वर्षों बच्चों को छतरी ओढ़कर शिक्षा अध्ययन करनी पड़ी थी,यह एक तस्वीर नहीं बल्कि यह एक जमीनी स्तर की परिस्थितियां हैं जहां शासन -प्रशासन भवन निर्माण व मरम्मत कार्य करने के लिए टेंडर प्रक्रिया से विद्या मंदिर की स्थितियों को दूरूस्त करने निलामी कर दिया जाता है। जबकि अफसरों की कुर्सी बारिश में सुरक्षित रहेगी और बच्चों का किताब बारिश से भीगती रहती है।तबतक शिक्षा व्यवस्था के हर आंकड़े कागजों में चलती रहेगी। अब ऐसा नहीं होना चाहिए, बल्कि उन बच्चों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्धता सुनिश्चित हो , जो कि बच्चे देश का भविष्य है।

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