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कांदा डोंगर को पर्यटन स्थल बनाने की तैयारी, जंगल के फलों पर किसका हक? एक वाहन विभाग के कब्जे में,तो दूसरी फरार भालू के निवाले पर इंसानों का कब्जा, सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ही घेरने के पीछे साजिश किसके ?सीताफल की निकासी से लेकर पत्रकारों को घेरने तक, कई गंभीर सवाल!

कांदा डोंगर को पर्यटन स्थल बनाने की तैयारी, जंगल के फलों पर किसका हक? एक वाहन विभाग के कब्जे में,तो दूसरी फरार भालू के निवाले पर इंसानों का कब्जा, सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ही घेरने के पीछे साजिश किसके ?सीताफल की निकासी से लेकर पत्रकारों को घेरने तक, कई गंभीर सवाल!

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कांदा डोंगर को पर्यटन स्थल बनाने की तैयारी, जंगल के फलों पर किसका हक? एक वाहन विभाग के कब्जे में,तो दूसरी फरार भालू के निवाले पर इंसानों का कब्जा, सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ही घेरने के पीछे साजिश किसके ?सीताफल की निकासी से लेकर पत्रकारों को घेरने तक, कई गंभीर सवाल!

अमलीपदर-:- वाह रे विकास! एक तरफ सरकार कांदा डोंगर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर इसकी प्राकृतिक सुंदरता को दुनिया के सामने लाने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी तरफ इसी जंगल में पैदा होने वाले सीताफल को दूसरे राज्य पहुंचाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

जंगल में फल लगते हैं, भालू खाते हैं, पक्षी खाते हैं, छोटे वन्यजीव अपना पेट भरते हैं। लेकिन सीजन आते ही अगर जंगल के फलों पर व्यापारियों की नजर पड़ जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जंगल की संपदा का असली हकदार कौन है?

और इस कहानी का सबसे चिंताजनक पहलू तो तब सामने आया, जब वन विभाग की कार्रवाई के दौरान ग्रामीणों द्वारा वनकर्मियों और मौके पर मौजूद पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार करने तथा एक पत्रकार को घेरकर रोकने की कोशिश किए जाने का आरोप सामने आया। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और कथित तौर पर पत्रकार से फोटो-वीडियो डिलीट करने की मांग भी की गई।

अब सवाल यह है कि जंगल की संपदा पर निगरानी रखना गलत है या निगरानी करने वालों को ही घेर लेना सही?

 

 

जंगल का सीताफल, किसकी थाली में जाएगा?

गरियाबंद जिले का कांदा डोंगर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और वन संपदा के लिए जाना जाता है। सरकार की मंशा है कि इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर नई पहचान दी जाए। लेकिन विकास की इस तस्वीर के पीछे जंगल की प्राकृतिक संपदा के संरक्षण को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

इन दिनों सीताफल का सीजन चल रहा है। आरोप है कि ओडिशा से पिकअप वाहन पहुंचकर स्थानीय लोगों से जंगल में पैदा होने वाला सीताफल खरीद रहे हैं और उसे दूसरे राज्य में भेज रहे हैं। इस खरीद-बिक्री में मंडी शुल्क से जुड़ी प्रक्रिया का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी जांच जरूरी है।

मामले में वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए ओडिशा से आए एक पिकअप वाहन क्रमांक OD 03 AF 7374 को पकड़ा है। वाहन को वन विभाग के कार्यालय ले जाने की जानकारी सामने आई है। तो वहीं दूसरी वाहन JH 02BV 0537 सीताफल भरकर फरार होने में कामयाब रहा । अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि फल कहां से एकत्र किए गए, कितनी मात्रा में ले जाए जा रहे थे और संबंधित नियमों का पालन किया गया या नहीं।

लेकिन यहां व्यंग्य का सवाल यह है कि जंगल को पर्यटन स्थल बनाने के लिए उसकी हरियाली, सुंदरता और वन्यजीवों को दिखाया जाएगा, मगर अगर उसी जंगल के फल लगातार बाहर जाते रहे, तो पर्यटकों को दिखाने के लिए बचेगा क्या—हरे-भरे पेड़ या सिर्फ विकास के दावे?

*भालू का भोजन या बाजार का कारोबार?*

कांदा डोंगर के जंगलों में भालुओं की मौजूदगी के पीछे यहां का प्राकृतिक वातावरण और भोजन की उपलब्धता भी अहम मानी जाती है। सीताफल जैसे मौसमी फल भालुओं के आहार का हिस्सा हैं। इसके अलावा पक्षी और कई छोटे वन्यजीव भी जंगल में मिलने वाले फलों पर निर्भर रहते हैं।

स्थानीय स्तर पर यह चिंता जताई जा रही है कि यदि जंगल के फलों की बड़े पैमाने पर निकासी होती है, तो वन्यजीवों के प्राकृतिक भोजन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, भालुओं के गांवों की ओर आने का एकमात्र कारण फलों की कमी है, ऐसा निष्कर्ष जांच और वैज्ञानिक तथ्यों के बिना नहीं निकाला जा सकता।

फिर भी सवाल गंभीर है—जंगल में पैदा होने वाला हर फल केवल बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि प्रकृति की खाद्य-श्रृंखला का भी हिस्सा है।

संयोग देखिए! इंसान के लिए सीताफल कारोबार का माल है, लेकिन जंगल में रहने वाले जीव के लिए वही सीताफल उसके भोजन का हिस्सा है। इंसान बाजार में भाव पूछता है और वन्यजीव प्रकृति पर निर्भर रहता है। अगर जंगल का भोजन ही जंगल से बाहर चला जाएगा, तो वन्यजीव आखिर अपना पेट कहां भरेंगे?

और जब भोजन की उपलब्धता घटती है, तो कुछ वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों की ओर भी रुख कर सकते हैं। ऐसे में बाद में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने पर सिर्फ भालू को दोष देना कितना उचित होगा?

*कार्रवाई वन विभाग की, लेकिन पत्रकारों को ही घेरने का आरोप!इसके पीछे की साजिश कर्ता कौन?*

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू वन विभाग की कार्रवाई के दौरान सामने आया।

मिली जानकारी के अनुसार, मौके पर मौजूद कुछ ग्रामीणों ने वन विभाग के कर्मचारियों के साथ अभद्र व्यवहार किया। आरोप यह भी है कि वहां मौजूद पत्रकारों को रोकने और एक पत्रकार को घेरकर बाहर जाने से रोकने की कोशिश की गई।

स्थिति बिगड़ने पर अन्य पत्रकारों ने इंदागांव थाना प्रभारी को सूचना दी और डायल 112 पर भी संपर्क किया। पुलिस मौके पर पहुंची और घटनाक्रम की जानकारी ली।

बताया गया कि जब पत्रकार साथी को वहां से निकालने का प्रयास किया गया, तब कुछ ग्रामीणों ने पुलिस के सामने कथित तौर पर यह शर्त रखी कि पत्रकारों द्वारा बनाए गए फोटो और वीडियो डिलीट करने के बाद ही उन्हें जाने दिया जाएगा। इसके बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में संबंधित पक्षों का आधिकारिक बयान और पुलिस की विस्तृत पुष्टि सामने आना बाकी है।

अब सवाल उठता है कि अगर किसी खबर, फोटो या वीडियो को लेकर आपत्ति है, तो उसका समाधान कानूनी तरीके से हो सकता है। लेकिन किसी पत्रकार को घेरना, रोकना या कथित तौर पर रिकॉर्डिंग मिटाने का दबाव बनाना आखिर किस नियम के तहत सही ठहराया जा सकता है? और इसके पीछे कौन सा व्यक्ति का साजिश है इसको भी जग जाहिर कराना जरूरी है

सवाल यह भी है—जंगल के फलों का हिसाब मांगने पर अगर पत्रकार को ही हिसाब देना पड़े, तो फिर खबर कौन दिखाएगा और सवाल कौन पूछेगा?

वन विभाग की कार्रवाई पर सवाल हो सकते हैं, उसकी जांच भी हो सकती है। पत्रकार की खबर पर आपत्ति भी दर्ज कराई जा सकती है। लेकिन किसी भी पक्ष को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।

*प्रकृति बचाने की बात, लेकिन जिम्मेदारी किसकी?*

सरकार एक ओर जंगल बचाने, पेड़ लगाने और वन्यजीवों को संरक्षण देने की बात करती है। दूसरी ओर, यदि जंगल से मौसमी फल बड़ी मात्रा में बाहर ले जाए जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह भी जरूरी है कि स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका और जंगल पर उनकी पारंपरिक निर्भरता को नजरअंदाज न किया जाए। जंगल से फल इकट्ठा करना और उन्हें बेचना अपने आप में हर परिस्थिति में अवैध नहीं माना जा सकता। लेकिन संग्रहण, परिवहन, वन नियमों और मंडी शुल्क से संबंधित जो भी प्रावधान लागू हों, उनका पालन होना चाहिए। कार्रवाई भी तथ्यों और कानून के आधार पर ही होनी चाहिए।

यानी समाधान ग्रामीणों को कटघरे में खड़ा करना भर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय लोगों को उचित लाभ मिले, वन संपदा का दोहन नियंत्रित रहे और वन्यजीवों का प्राकृतिक भोजन सुरक्षित रहे।

क्योंकि जंगल केवल इंसानों की कमाई का साधन नहीं है। यह पक्षियों का बसेरा, भालुओं का भोजन और आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत भी है।

अब कांदा डोंगर से उठ रहे सवाल सिर्फ सीताफल की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं हैं। सवाल जंगल की निगरानी, वन्यजीवों के भोजन, सरकारी दावों और पत्रकारों की सुरक्षा तक पहुंच चुके हैं।

एक तरफ पर्यटन स्थल बनाने की तैयारी है, दूसरी तरफ जंगल के फलों की निकासी की शिकायतें हैं। वन विभाग ने वाहन पकड़ा है, लेकिन अब देखना होगा कि जांच में क्या सामने आता है और आगे क्या कार्रवाई होती है।

और सबसे बड़ा सवाल—क्या कांदा डोंगर में जंगल बचाने वालों को संरक्षण मिलेगा, या जंगल की संपदा पर सवाल उठाने वालों को ही घेरने की कोशिश होती रहेगी?

क्योंकि अगर जंगल के फल ही जंगल में नहीं बचेंगे, तो भालू, पक्षी और दूसरे वन्यजीव आखिर किस भरोसे जंगल में रहेंगे?

याद रखिए—पर्यटन के लिए जंगल की सुंदरता चाहिए, कारोबार के लिए जंगल के फल चाहिए, लेकिन प्रकृति को बचाने के लिए जिम्मेदारी भी चाहिए। वरना एक दिन जंगल तो नक्शे पर रहेगा, लेकिन उसकी असली पहचान और जैव विविधता सिर्फ तस्वीरों में सिमटकर रह जाएगी।

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