बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की पड़ोसी कूटनीति पर हुआ राष्ट्रीय मंथन आईएसबीएम विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

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बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की पड़ोसी कूटनीति पर हुआ राष्ट्रीय मंथन आईएसबीएम विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

छुरा–:–आईएसबीएम विश्वविद्यालय कोसमी (छुरा) के तत्वाधान में इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) के सहयोग से एवं कला एवं मानविकी विभाग द्वारा “बदलते वैश्विक दौर में भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की नई सोच” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ।इसमें देश भर से शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, फैकल्टी सदस्यों और छात्रों ने हिस्सा लेकर व्यापक चर्चा की।

सम्मेलन का दूसरा दिन भारत की पड़ोसी नीति, बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, पर्यावरणीय सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा मानव सुरक्षा जैसे समकालीन विषयों पर गंभीर अकादमिक विमर्श के नाम रहा।

सम्मेलन में डॉ. अमित कुमार गुप्ता ने “भारत की विदेश नीति और पड़ोसी देश एक विकसित होती यात्रा” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि भारत की विदेश नीति को समझने के लिए उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक है। भारत केवल दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश ही नहीं है, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसकी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे पड़ोसी देशों से जुड़ी हुई है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, शांतिपूर्ण और स्थिर पड़ोस भारत के विकास और राष्ट्रीय हितों के लिए आवश्यक है। दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहयोग की दृष्टि से भारत तथा उसके पड़ोसी देशों के बीच रचनात्मक संवाद और पारस्परिक समझ के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

तकनीकी सत्र का एक प्रमुख आकर्षण डॉ. अमन झा का व्याख्यान रहा। उन्होंने “विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका” विषय पर विचार प्रस्तुत किए। इस विषय ने सम्मेलन को समकालीन तकनीकी परिवर्तन से जोड़ते हुए विदेश नीति के नए आयामों पर विचार करने का अवसर प्रदान किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आंकड़ा-आधारित विश्लेषण, सूचना के तीव्र प्रसार और नई तकनीकों के प्रभाव ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन तथा कूटनीतिक निर्णय-प्रक्रियाओं के सामने नई संभावनाओं के साथ नई चुनौतियां भी प्रस्तुत की हैं।

सम्मलेन के अगले वक्ता के रूप में डॉ. राणा नवनीत रॉय ने “सीमाओं से परे जलवायु परिवर्तन, मानव सुरक्षा और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग” विषय पर विशेष व्याख्यान प्रस्तुत किया। यह सबसे समकालीन विषयों में से एक पर केंद्रित रहा। साथ ही उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं, बल्कि मानव जीवन, आजीविका, स्वास्थ्य, खाद्य एवं जल सुरक्षा, प्रवासन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े व्यापक प्रश्न के रूप में समझने का प्रयास किया गया।

सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों एवं संस्थानों से जुड़े शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने विविध विषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। प्रस्तुतियों की विषय-वस्तु ने सम्मेलन के बहुविषयक चरित्र को और अधिक व्यापक बनाया। इनमें भारत के सीमावर्ती पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क, आर्थिक कूटनीति, व्यापारिक संबंध, सांस्कृतिक रिश्ते, पर्यावरणीय सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साहित्य, प्रवासन, सीमाई प्रश्न तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय प्रमुख रहे। कई शोध प्रस्तुतियों में भारत और दक्षिण एशिया के संबंधों को परंपरागत कूटनीतिक विमर्श से आगे बढ़ाकर नई चुनौतियों से जोड़ने का प्रयास किया गया।

कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. मुमताज़ परवीन एवं प्रवीण कुमार साहू ने किया। सम्मेलन के संयोजक डॉ. जब्बार अहमद ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन से जुड़े अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षाविदों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों, आयोजन समिति के सदस्यों तथा आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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