[gtranslate]

कमाल शब्दों का – ‘कुल’ और ‘कूल’ : शब्द एक अर्थ अनेक, युग-युग का सौंदर्य *कुल और कूल का प्रभाव – स्कूल, गुरुकुल, अनुकूल और प्रतिकूल पर भी* – डॉ मुन्नालाल देवदास

कमाल शब्दों का – ‘कुल’ और ‘कूल’ : शब्द एक अर्थ अनेक, युग-युग का सौंदर्य *कुल और कूल का प्रभाव – स्कूल, गुरुकुल, अनुकूल और प्रतिकूल पर भी* – डॉ मुन्नालाल देवदास

इन्हे भी जरूर देखे

✍️ लोकहित 24 न्यूज़ संवाददाता विक्रम कुमार नागेश की रिपोर्ट गरियाबंद छत्तीसगढ़ 

गरियाबंद _ हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है शब्दों का सौंदर्य और उनका संदर्भ बदलते ही अर्थ का नया संसार रच देना। ‘कुल’ और ‘कूल’ ऐसे ही दो शब्द हैं। देखने में एक-सी ध्वनि, पर अर्थ की नदी में बहते हुए दोनों के घाट अलग-अलग। ‘कुल’ कभी जोड़ बनाता है, कभी वंश की मर्यादा बन जाता है। ‘कूल’ नदी का किनारा है, ठहराव का प्रतीक। इन्हीं से निकलते हैं स्कूल, गुरुकुल, अनुकूल, प्रतिकूल — हर युग में नए अर्थ ओढ़े हुए।

1. पौराणिक युग : मर्यादा का ‘कुल’

‘कुल’ का सबसे उदात्त रूप हमें रामायण में मिलता है — *रघुकुल*। यहाँ ‘कुल’ केवल वंश नहीं, एक आचार-संहिता है।
रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।
राम के लिए ‘कुल’ की मर्यादा प्राणों से बड़ी थी। दशरथ ने वचन दिया तो राम वन चले गए। भरत ने ‘कुल’ की लाज रखी और सिंहासन पर खड़ाऊँ रखकर राज किया।

यही ‘कुल’ शिक्षा के क्षेत्र में ‘गुरुकुल’ बना। गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई। राम, कृष्ण, पांडव — सबने गुरु के आश्रम में, गुरु के ‘कुल’ के साथ रहकर विद्या पाई। वहाँ न फीस थी, न भवन का आडंबर। गुरु का सान्निध्य ही ‘कूल’ था — ज्ञान की नदी का वह किनारा जहाँ शिष्य तर जाता था।

2. ऐतिहासिक युग : ‘कुल’ से ‘स्कूल’ तक की यात्रा

समय बदला। विदेशी आक्रमणों के साथ नालंदा-तक्षशिला के गुरुकुल उजड़े। अंग्रेज आए तो ‘गुरुकुल’ की जगह ‘स्कूल’ ने ली। ‘स्कूल’ शब्द भले विदेशी हो, पर उसने ‘कुल’ को नया अर्थ दिया — विद्यालय, पाठशाला। शासकीय स्कूल, अनुदान प्राप्त स्कूल, अशासकीय स्कूल — शिक्षा ‘कुल’ से निकलकर ‘कुल’ यानी सबके योग के लिए हो गई।

इतिहास गवाह है कि जब परिस्थिति ‘अनुकूल’ हुई, भारत में नवजागरण आया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्कूल खोले। पर जब शासन ‘प्रतिकूल’ हुआ, तो लाला लाजपत राय को लाठियाँ खानी पड़ीं। ‘कुल’ की मर्यादा बचाने के लिए मंगल पांडे ने प्राण दिए, क्योंकि उनके लिए सैनिक ‘कुल’ का वचन ही धर्म था।

3. आधुनिक युग : ‘अनुकूल’ और ‘प्रतिकूल’ का द्वंद्व

आज ‘कुल’ गणित में योग है — दो और दो का कुल चार। वाणिज्य में कुल जमा, कुल खर्च। परिवार में ‘कुल’ वंश-परंपरा है, पर नई पीढ़ी पूछती है — ‘कुल’ की लाज जरूरी है या व्यक्तिगत आज़ादी?

‘स्कूल’ अब स्मार्ट हो गए, पर ‘गुरुकुल’ का संस्कार खोजता है NEP 2020। ऑनलाइन कक्षा ‘अनुकूल’ है सुविधा के लिए, पर मोबाइल की लत ‘प्रतिकूल’ है एकाग्रता के लिए। किसान कहता है — मौसम ‘अनुकूल’ रहे तो फसल अच्छी, ‘प्रतिकूल’ हुआ तो कर्ज। नेता के लिए जनता का मूड ‘अनुकूल’ होना चाहिए, ‘प्रतिकूल’ हुआ तो कुर्सी गई।

‘कूल’ आज भी नदी का किनारा है। पर युवा पीढ़ी की जुबान पर ‘कूल’ का अर्थ है — बिंदास, मस्त। “यार, तू तो बड़ा कूल है!” यहाँ ‘कूल’ ठंडक नहीं, व्यक्तित्व का ठहराव है। नदी का ‘कूल’ डूबते को बचाता है, और यह वाला ‘कूल’ तनाव में डूबते मन को किनारा देता है।

निष्कर्ष : शब्दों की गंगा

‘कुल’ और ‘कूल’ — एक बीज से फूटे दो वृक्ष। एक आकाश छूता है मर्यादा, परंपरा, योग बनकर। दूसरा धरती से लगा रहता है किनारा, ठहराव, शीतलता बनकर। पौराणिक काल में ‘कुल’ धर्म था, ऐतिहासिक काल में ‘स्कूल’ बना, आधुनिक काल में ‘अनुकूल-प्रतिकूल’ जीवन का गणित बन गया।

शब्द मरते नहीं, युग के वस्त्र पहनकर फिर आ जाते हैं। तुलसी का ‘रघुकुल’ आज भी संविधान की ‘मूल भावना’ में जिंदा है। गुरु वशिष्ठ का ‘गुरुकुल’ आज ‘आवासीय विद्यालय’ में सांस ले रहा है। जरूरत है कि हम ‘कुल’ की मर्यादा और ‘कूल’ के धैर्य को साथ लेकर चलें — तभी समाज की नदी ‘अनुकूल’ बहेगी, ‘प्रतिकूल’ नहीं।

शब्दों का यह रस, यह सौंदर्य ही हिन्दी को जननी बनाता है। कुल मिलाकर बात इतनी है कि अर्थ बदलते हैं, आत्मा नहीं बदलती।

डॉ मुन्नालाल देवदास
राष्ट्रपति व राज्यपाल पुरस्कृत सेवानिवृत्त प्रधान पाठक नवाचारी शिक्षाविद, गीतकार,साहित्यकार
नगर पंचायत कोपरा जिला गरियाबंद छत्तीसगढ़
मो 99936 44766

 

विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)

इन्हे भी जरूर देखे

Must Read