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आधार की पहचान में फंसा मदन का अधिकार, मशीन ने मांगे अंगूठे तो व्यवस्था ने दिखाया गरियाबंद का रास्ता

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अमलीपदर-:- दिव्यांग युवक के हाथों की मजबूरी के आगे आधार की बायोमेट्रिक व्यवस्था बेबस, कलेक्टर से तहसीलदार तक पहुंची फरियाद; अब जिला मुख्यालय जाने की सलाह

सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार आज जरूरी दस्तावेज बन चुका है, लेकिन जब किसी दिव्यांग नागरिक के लिए आधार बनवाना ही मुश्किल हो जाए तो सवाल सिर्फ एक दस्तावेज का नहीं, बल्कि व्यवस्था की पहुंच का भी बन जाता है। अमलीपदर क्षेत्र के मुड़ा गांव निवासी 30 वर्षीय दिव्यांग मदन नागेश की कहानी कुछ ऐसी ही है।

बचपन में हुए हादसे के बाद मदन की शारीरिक स्थिति गंभीर हो गई। आज हालत यह है कि रोजमर्रा के कई कामों के लिए उन्हें अपनी बुजुर्ग मां के सहारे की जरूरत पड़ती है। ऐसे में आधार बनवाने की प्रक्रिया उनके लिए एक और बड़ी चुनौती बन गई है।

आधार पंजीयन के दौरान बायोमेट्रिक सत्यापन जरूरी होता है, लेकिन मदन के हाथों की स्थिति ऐसी है कि सामान्य तरीके से उंगलियों के निशान देना उनके लिए बेहद कठिन है। परिवार के अनुसार, आधार बनवाने की उम्मीद लेकर मदन और उनकी मां दो बार कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया।

इसके बाद उन्होंने अमलीपदर तहसीलदार अनिल चंद्रवंशी से भी मुलाकात कर अपनी परेशानी बताई। तहसीलदार के अनुसार संबंधित विभाग से चर्चा कर ऑपरेटर को मामले की जानकारी दी गई है। साथ ही मदन को गरियाबंद जाकर आधार बनवाने की सलाह दी गई है।

अब सवाल यह है कि जिस युवक को अपने दैनिक जीवन के लिए भी किसी के सहारे की जरूरत है, उसके लिए अमलीपदर से गरियाबंद तक की दौड़ कितनी आसान होगी? क्या ऐसी परिस्थितियों वाले दिव्यांग नागरिकों के लिए स्थानीय स्तर पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकती?

आधार की परेशानी के बीच तहसील की अपनी भी कहानी

मदन की परेशानी केवल आधार तक सीमित नहीं है। अमलीपदर तहसील की व्यवस्था भी लंबे समय से स्थायी ठिकाने की तलाश में दिखाई दे रही है। वर्ष 2022 में तहसील बनने के बाद कार्यालय की शुरुआत पुजारीपारा स्थित पुराने स्कूल भवन से हुई। इसके बाद जगह की कमी के चलते इसे पुराने अस्पताल भवन में स्थानांतरित किया गया और अब पंचायत परिसर के पास स्थित अटल डिजिटल केंद्र के भवन में तहसील कार्यालय संचालित होने की बात सामने आ रही है।

नतीजा यह कि आम नागरिक पुराने कार्यालय तक पहुंचते हैं और वहां से नए ठिकाने की जानकारी तलाशते हैं। यानी जिस तहसील का उद्देश्य लोगों को प्रशासनिक सुविधाएं उनके करीब उपलब्ध कराना है, उसका कार्यालय ही अलग-अलग ठिकानों के बीच घूमता नजर आ रहा है।

96 लाख का भवन, लागत 1.30 करोड़ के करीब; फिर भी अधूरा

इधर अमलीपदर से करीब तीन किलोमीटर दूर नया तहसील भवन निर्माणाधीन है। इसकी शुरुआती लागत करीब 96 लाख रुपए बताई गई थी, जो बढ़कर लगभग 1.30 करोड़ रुपए तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। इसके बावजूद भवन का काम अब तक पूरी तरह पूरा नहीं होने की शिकायत है।
खिड़की-दरवाजों का काम अधूरा होने के साथ भवन में दरारें और पानी टपकने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि जिस स्थायी तहसील भवन के जरिए क्षेत्र के लोगों को बेहतर प्रशासनिक सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वह कब पूरी तरह तैयार होगा?

एक तरफ करोड़ों की लागत वाला तहसील भवन अब भी पूर्णता का इंतजार कर रहा है, तो दूसरी तरफ मदन नागेश जैसा दिव्यांग नागरिक एक आधार कार्ड के लिए

कार्यालय-दर-कार्यालय भटक रहा है।
सवाल सीधा है—जब व्यवस्था को मदन की मजबूरी पहले से दिखाई दे रही है, तो सुविधा उसके दरवाजे तक कब पहुंचेगी?

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